शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

वंदे मातरम

....काश ! बंटवारा न हुआ होता ‘एक भारतवर्ष का’ ‘दो दिलों का’ और ‘तीन रंगों का’

रात 12 बजने के साथ मेरा देश और मेरे प्यारे देशवासी आज़ादी का 69वें वर्ष का जश्न मना रहे हैं| हम सभी के लिए यह दिन अत्यंत हर्ष लेकर आता है| ...लेकिन साथ में एक दर्द भी जगा देता है, बंटवारे का दर्द| कई क्षोभ मन मस्तिष्क को परेशान कर जाते हैं|

हम सभी जानते हैं कि इनका हल कुछ नहीं है, यह पेचीदगियाँ हमें आज़ादी के साथ ही भेंट में मिल गईं थीं| लेकिन फिर भी दिल हर बार यह कह ही उठता है कि ‘काश! जिन्ना की टी.बी. और फिर कैंसर की खबर पटेल ने छुपाई न होती तो कुछ और राह निकल आती’ काश! माउन्टबेटन को जिन्ना की बीमारी की सूचना समय पर मिल जाती तो वो हमारी आज़ादी को बेशक दो वर्ष और टाल देते और हमारी धरती का बंटवारा भी रुक जाता’ ‘काश! जिन्ना को अपने अंतिम दिनों में नहीं बल्कि पहले ही एहसास हो जाता कि पकिस्तान मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी भूल थी   ....काश ! बंटवारा न हुआ होता ‘एक हिंदुस्तान का’ ‘दो दिलों का’ और ‘तीन रंगों का’

बंटवारे के बाद भी – ‘काश! जम्मू-कश्मीर का मुद्दा पंडित नेहरु के नहीं बल्कि सरदार पटेल के सुपुर्द किया जाता’ ‘काश! कश्मीर-मसला हैदराबाद-मसले की तरह हल कर लिया जाता, यूनाईटेड नेशन में न ले जाया जाता’ ‘काश! हमारे देश को पहले प्रधानमंत्री में रूप में सरदार पटेल जैसा नायक मिल जाता’

इन सबके बावजूद “जय हिन्द” “माँ तुझे सलाम- वन्दे मातरम्”
- रश्मि

शनिवार, 8 अगस्त 2015

राधे माँ

दोस्तों! वैसे राधेमाँ का अपराध क्या है? वो तो बेचारी, सुंदर, गोरी, चमचमाती महिला हैं...आप सब उन्हें कटघरे में क्यों खड़ा कर रहे हैं? मुझे तो उस महिला का कोई दोष नहीं नज़र आता!!!! .
...
...
...
...
क्या??? आपका कहना है कि वह धर्म के नाम पर गुमराह कर रही है!!! व्यभिचार फैला रही है!!!
...
...
अरे!! तो वही तो समझा रही हूं मैं...आप खुद को शिकार बनने ही क्यों देते हैं!!! ऐसे लोगों को इस स्तर तक बढ़ावा ही क्यों देते हैं!!! उस औरत को कटघरे में खड़ा करने वाले आप सब खुद गुनहगार हैं।
विरोध करना ही है तो शुरू से करिए।

जय हिंद

शनिवार, 23 मई 2015

स्टेटमेंट

कुछ मित्र यह कहानी पढ़ना चाहते हैं किन्तु उन्हें मिल नहीं रही थी अत: उनके अनुरोध पर दोबारा डाल रही हूँ |

स्टेटमेंट (कहानी)
प्रकाशन :1/7/2015 रश्मि

“चल छोरी ! मंदिर चल म्हारे साथ। थारा जी बहल जावेगा। ”
“मन्ने नी जाना। ”
कजरी जानती थी कि उसकी पोती जिस हादसे से निकली है, उसके ज़ख्म इतनी आसानी से नहीं भरने वाले। कभी वह खुद भी तो इस ज़ख्म से अपने तन-मन को छलनी कर चुकी थी इसलिए अपनी पोती के दर्द को बखूबी समझ सकती थी। वह तो फिर भी सोलह-सत्रह बरस की थी लेकिन उसकी फुलवा ...उसकी पोती वह तो अभी दस ही बरस की है और इतना बड़ा वज्र सह गई। कजरी को अपना लड़कपन याद हो आया। सोलह-सत्रह की ही रही होगी वो, जब गौना होकर अपने सासरे लौटी थी। ...और अपने ही गाँव के मुखिया की बदनियती का शिकार बन गई थी।
उसकी मुँह दिखाई के दिन की बात है, जब पूरे गाँव की लुगाइयाँ उसके आँगन में जुड़ आईं थीं तब सास ने सबके सामने कहा था – “बहुरिया ! पूरे गाँव ने अपना ही घर मानिजो। यहाँ सब तेरे अपने ही रिश्ते-नातेदार हैं। कोई तेरी माँ समान है तो कोई तेरी भाभी समान ...कोई तेरी बहन सरीखी है तो कोई तेरी सहेली-सी। बीनणी ! तू सबने अपना पिता और भाई मानिजो। ”
मैंने भी हामी में अपना सर हिलाया था ...और सच भी था, मुझे पूरे गाँव का प्यार मिला। इतना प्यार कि अपने पीहर की भी सुध न रही थी। जो जो रिश्ते वहाँ पीहर में बिछुड़े, वो सब यहाँ सासरे में मिल गए थे। इन्हीं सब अच्छे लोगों के बीच एक इंसान, उसकी नियत कब बदल गई ...कि राम जाने वह पहले से ही ऐसा ही था, पता ही न चला। वह इंसान था म्हारे ही गाँव का मुखिया। मैं उसके आगे लाख गिड़गिड़ाई ...हाथ जोड़के मिन्नतें कीं ...अपने पेट से होने की दुहाई दी ...लानतें दीं ...तड़फी ...मचली और फिर सिसकती ही रह गई। मैं अपने दर्द को जिस्म में लिए आत्मा के भीतर दबा गई। मुखिया की धमकी और लोकलाज के भय से किसी के भी आगे अपना मुँह न खोला और साल दर साल बीतते गए। वह निगोड़ा मुखिया भी दूसरे ही बरस बीमारी के चलते राम जी को प्यारा हो गया। ...और मैं बड़े जतन करके उस काली याद को किसी अँधेरे कुएँ में दफना आई थी और अपनी आगे की ज़िन्दगी सँवारने लगी।
धीरे-धीरे समय बीता ...सात बच्चे जने ...फिर अपने बच्चों में ही रम गई। माँ बनी ...फिर दादी बनी। अब जब वही सब मेरी पोती के साथ दोहराया गया तो सालों बाद दर्द की सारी परतें फिर उघड़ गईं, ज़खम फिर से हरा हो उठा। उसी मुखिया के बिगड़े सपूत ने म्हारी फूल-सी पोती को मसल डाला। यह तो बेचारी अभी इन सबका मतलब भी न जाने थी। क्या होवे हैं आदमी-औरत के रिश्ते ...कैसी होवे है तन की भूख ...कुछ भी तो न जाने थी। उम्र ही क्या है अभी इसकी, दस बरस की ही तो है अभी म्हारी छोरी। दस बरस में वो क्या जानती तन के खिलवाड़ ...जिस्म के नोच-खंसोट। कजरी मन-ही-मन अपना जी कड़वा किये जा रही थी और सामने बैठी उसकी पोती फुलवा डलिया बिन रही थी।
महीने-भर पहले गाँव के मुखिया के छोरे ने फुलवा की इज्ज़त को तार-तार कर दिया था। घर आकर बहुत रोई बेचारी बच्ची। वह नादान तो अब तक ना समझ पा रही थी कि ‘आखिर उसके साथ ये हुआ क्या है !’
जब फुलवा छोटी-सी थी, तभी से खूब मार खाती आई थी। अपने बापू से खूब पिटती थी। उसकी माँ भी कभी-कभार उसे झाड़ू या चिमटे से पीट देती। बड़ी अम्मा (कजरी) बस चिल्लाकर ही रह जातीं, एक वो ही थीं, जो उसे कभी पीटतीं न थीं। ...यहाँ तक कि उसका छुटका भाई भी जो हाथ आए वही फुलवा पे दे मारता था। इसलिए बचपन से ही मार-पिटाई सहने की खूब आदत थी फुलवा को। उसने देखा था कि जब उसके बापू को छुटके पर खूब गुस्सा आता तो वह उसकी बुशर्ट उतार कर नंगी पीठ पर मारता। इससे छुटके को खूब लगती ...सीधे चमड़ी पे। लेकिन फुलवा इस बात पर बड़ी हैरान होती कि उसकी माँ तो निरीह गाय-सी, पूरे दिन चुपचाप घर भर के काम करती रहती है ...किसी के भी साथ कोई फूटे बोल पलट के भी न बोलती है ...फिर काहे को उसका बापू हर दूसरे तीसरे दिन आधी रात को उसकी माँ का बदन उघाड़ कर पीटता है ! दबोचता है ! कचोटता है ! काहे बेचारी पे चढ़ बैठता है और वह सिसकती रह जाती है ...बस यही बात फुलवा नहीं समझ पाती थी।
एक दिन फुलवा अपनी बनाई टोकरियाँ सिर पर धरकर पगडंडियों और खेतों से होती हुई मंडी की तरफ चली जा रही थी। रास्ते में मुखिया जी का छोरा मिल गया। बोला – “फुलवा ! कहाँ ले जा रही है ये टोकरियाँ ? एक-आध म्हारे घर भी पहुँचा दे। अम्मा खुश हो जाएगी। ”
“भाईसा ! अपने पसंद के रंग और दाम बताओ। मैं कल ही बीन के हवेली पहुँचा दूँगी। ”
“जे बात ! तीन रंग-बिरंगी टोकरीं बीन के हवेली पहुँचा देना और उनके दाम इसी टेम यहीं पे आके म्हारे हाथों से ले जाना। "
‘हाँ’ में सिर हिलाकर फुलवा मंडी को चल दी। वह किसी से भी ज्यादा बोलती चालती ना थी। स्वभाव से वह अपनी माँ पर ही गई थी। काम से काम बस ! न ज्यादा किसी से बोलना ...न ही बिना काम कहीं घूमना-फिरना। फुलवा उस दिन शाम ढले बाज़ार से लौटी, घर पहुँची और चटपट रंगबिरंगी टोकरियाँ बुनने बैठ गई। घर के बाकी लोग भी यह जानकर खूब खुश हुए कि हवेली में टोकरियाँ जावेंगी तो दाम भी अच्छे मिलेंगे। फुलवा अगले दिन बाजार न गई। दिन भर टोकरियाँ बीनती रही। सांझ तक तीन टोकरियाँ बनाकर हवेली पहुँचाने चल दी। हुकुम टोकरियों को देखकर बड़ी खुश हुईं और उन्होंने फुलवा को उनके दाम चुका दिए। जब फुलवा घर लौट रही थी तो गन्ने के घने खेतों के बीच मुखिया के छोरे ने उसे अपनी और घसीट लिया।
“क्यों री ! तूने अम्मा से पैसे क्यों लिए, मैंने कहा था न कि मैं दूँगा। ”
“मालकिन ने दे दिए तो मैं काईं करती भाईसा ?” उसने कसमसाते हुए और खुद को उसके चंगुल से छुड़ाते हुए कहा।
“लेकिन इब म्हने भी देने का मन है ...फुलवा मैं काईं करूँ ? इब म्हारे से भी ले ...।”
फुलवा हाथ जोड़कर माफी माँगती रही... रोती रही ...लेकिन उसके तन से एक-एक कपड़ा उतरता गया। नादान बच्ची अब तक यही सोचती रही कि जैसे मेरा बापू छुटके को (कभी भी) और माँ को (आधी रात को) कपड़े उतार कर पीटता है वैसे ही छोटे मालिक भी पीटेंगे ...और वह मासूम लड़की कुचली जाती रही, मसली जाती रही। जो फुलवा के साथ हो रहा था, वह उसका मतलब भी नहीं समझती थी। बस वह इतना ही जानती थी कि इससे पहले कभी किसी ने उसे इस तरह से नहीं पीटा है। उसकी जांघों के बीच से खून रिस रहा था। तन का हर हिस्सा दुख रहा था। वह समझ ही न पा रही थी कि उसे मारा गया है कि रौंदा गया है। वह इस उम्र में बलात्कार के मायने ही कहाँ जानती थी !
रात होने को आई थी, आसमान धुंधलका हो चला था। फुलवा के मन के भीतर भी गहरी दुविधा मची थी, वह मासूम अब तक इसी ऊहापोह में थी कि छोटे मालिक ने उसका बदन उघाड़ के उसे क्यों पीटा ? क्या उन्हें टोकरियों के रंग पसंद नहीं आए ? ...या मैंने बड़ी मालकिन से पैसे ले लिए क्या इस कारण से नाराज़ हो गए ? ... बेचारी जैसे-तैसे उठी, खुद को समेटा और कराहती हुई घर चल दी। माँ की नज़र ज्यों ही बच्ची पर पड़ी वह दौड़ पड़ी और अपनी कोखजाई को आंचल में छुपाकर कोठरी के भीतर खींच लाई। माँ रोती जाती थी और फुलवा को बाहों में भींचती जाती भी। बापू, बड़ी अम्मा, छुटका सब उसके जिस्म से बहता खून देख-देखकर रो रहे थे। बड़ी माँ ने इतना ही पूछा था – “छोरी थारा जे हाल किस निपूते ने किया ?” ...और फुलवा के मुँह से ‘छोटे मालिक’ का नाम सुनके उसका बापू जहर बुझे सांप-सा बिलबिला के रह गया था। ...फिर कई दिन तक माँ ने फूलवा की देखभाल की। किसी ने भी उसे घर से बाहर ना जाने दिया।
एक दिन फुलवा के बापू ने आकर कहा – “चल फुलवा, म्हारे साथ चल, उस छोरे की सिकायत मैंने सरपंच जी से की थी। सरपंच जी थारा सटेटमेंट लेवेंगे। वे जो भी पूछें सच्ची-सच्ची कह देना, सरमाना मत छोरी ...और ना ही घबराना। मैं तो उस दरिन्दे को कोरट-कचहरी तक खींचूँगा। बड़े होंगे तो अपने घर के। जेल की हवा न खिला दी तो ...।”
फुलवा सिर झुकाए बापू के पीछे-पीछे चल दी। सरपंच ने बच्ची के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और कमरे के भीतर ले गए। अकेले में बड़े प्यार से उसका बयान लिया और उसके बापू को दो-तीन दिन बाद फिर आने की कह कर वापस भेज दिया। तीन दिन के बाद विधायक जी ने खुद उसे और फुलवा को हवेली में बुलवा भेजा। फुलवा का बापू समझ गया कि यह सब उसकी शिकायत का ही असर है और अब तो ज़रूर उस छोरे को सजा हो ही जावेगी। वह बेटी को लेकर विधायक की ड्योढ़ी पर पहुँचा।
“राधे ! मैं बच्ची से अकेले में बात करना चाहूँ हूँ। ” ...और वह फुलवा को भीतर ले गया। बड़े प्यार से उसके तन पर हाथ फेर-फेर के बयान लेता रहा।
यूँ ही दो हफ्ते बीत गए। फुलवा की अम्मा ने उसके बापू को खूब समझाया कि, "बेटी की जात है, मत करो जिद्द ...इन ऊँची हवेली वालों को कोई सजा न होवेगी बल्कि हमारी ही इज्जत खाक में मिलती जावेगी। बिटिया के जखम हम मिलके भर देवेंगे। काहे बार-बार सबके सामने अपनी ही इज्जत को उघाड़ना। कोई बयान लेवेगा, कोई गवाही, तो कोई सटेटमेंट ...गरीब की कब कौन सुनता है ...हमें कब मिला है न्याय जो अब मिलेगा। ”


मित्रों ! आगे की कहानी पढ़ने के लिए क्लिक करेंhttp://www.srijangatha.com/Kahani7Jan2015

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

हमारी चेतना

पूरे दिन में कुछ समय हमें सिर्फ अपने लिए निकालना चाहिए| उस समय कोई हमारे साथ न हो, न प्रत्यक्ष में और न ही मन में| हम सिर्फ अपने साथ हों ...सिर्फ अपने साथ ...एकदम अकेले| धीरे-धीरे हमें एक परम सत्ता का अहसास होने लगेगा ...हमें अहसास होने लगेगा कि सारी सृष्टि हममे ही समा रही है ...या...हम विस्तृत और विस्तृत होते जा रहे हैं ...इतने विस्तृत कि हमारी चेतना पूरी सृष्टि में फ़ैलती जा रही है|

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

सही और गलत

हम सही और गलत को कैसे तय करते हैं? कैसे डिसाइड करते हैं कि यह मानने योग्य है और यह मानने योग्य नहीं है?
जैसे सभी को पता है कि छत से कूदेंगे तो हमारे हाथ पैर टूट जाएँगे या मर भी सकते हैं, तो हम सीढ़ी से उतर आते हैं।
कोई कंकर-पत्थर नहीं खाता क्योंकि सभी को मालूम है कि ये पचेंगे नहीं, तो मूर्ख से मूर्ख भी उन्हें नहीं खाता।
.....लेकिन तब फिर झूठ बोलना, धोखा देना, नुक्सान पहुँचाना ये कैसे सब कैसे खुशीे सकते हैं!! ....मुझे तो नहीं देते। यदि किसी को देते हैं तो फिर उसके लिए वही सही है, वही मानने योग्य है।
मानकर देखिए नतीजा कुछ ही दिनों में मिलने लगेगा जो छत से कूदने या कंकर खाने से कहीं ज्यादा कष्टकर होगा।— आपकी रश्मि

रविवार, 29 मार्च 2015

स्टेटमेंट

स्टेटमेंट

प्रकाशन :1/7/2015
रश्मि
ल छोरी ! मंदिर चल म्हारे साथ। थारा जी बहल जावेगा। ”
“मन्ने नी जाना। ”
कजरी जानती थी कि उसकी पोती जिस हादसे से निकली है, उसके ज़ख्म इतनी आसानी से नहीं भरने वाले। कभी वह खुद भी तो इस ज़ख्म से अपने तन-मन को छलनी कर चुकी थी इसलिए अपनी पोती के दर्द को बखूबी समझ सकती थी। वह तो फिर भी सोलह-सत्रह बरस की थी लेकिन उसकी फुलवा ...उसकी पोती वह तो अभी दस ही बरस की है और इतना बड़ा वज्र सह गई। कजरी को अपना लड़कपन याद हो आया। सोलह-सत्रह की ही रही होगी वो, जब गौना होकर अपने सासरे लौटी थी। ...और अपने ही गाँव के मुखिया की बदनियती का शिकार बन गई थी।
उसकी मुँह दिखाई के दिन की बात है, जब पूरे गाँव की लुगाइयाँ उसके आँगन में जुड़ आईं थीं तब सास ने सबके सामने कहा था – “बहुरिया ! पूरे गाँव ने अपना ही घर मानिजो। यहाँ सब तेरे अपने ही रिश्ते-नातेदार हैं। कोई तेरी माँ समान है तो कोई तेरी भाभी समान ...कोई तेरी बहन सरीखी है तो कोई तेरी सहेली-सी। बीनणी ! तू सबने अपना पिता और भाई मानिजो। ”
मैंने भी हामी में अपना सर हिलाया था ...और सच भी था, मुझे पूरे गाँव का प्यार मिला। इतना प्यार कि अपने पीहर की भी सुध न रही थी। जो जो रिश्ते वहाँ पीहर में बिछुड़े, वो सब यहाँ सासरे में मिल गए थे। इन्हीं सब अच्छे लोगों के बीच एक इंसान, उसकी नियत कब बदल गई ...कि राम जाने वह पहले से ही ऐसा ही था, पता ही न चला। वह इंसान था म्हारे ही गाँव का मुखिया। मैं उसके आगे लाख गिड़गिड़ाई ...हाथ जोड़के मिन्नतें कीं ...अपने पेट से होने की दुहाई दी ...लानतें दीं ...तड़फी ...मचली और फिर सिसकती ही रह गई। मैं अपने दर्द को जिस्म में लिए आत्मा के भीतर दबा गई। मुखिया की धमकी और लोकलाज के भय से किसी के भी आगे अपना मुँह न खोला और साल दर साल बीतते गए। वह निगोड़ा मुखिया भी दूसरे ही बरस बीमारी के चलते राम जी को प्यारा हो गया। ...और मैं बड़े जतन करके उस काली याद को किसी अँधेरे कुएँ में दफना आई थी और अपनी आगे की ज़िन्दगी सँवारने लगी।
धीरे-धीरे समय बीता ...सात बच्चे जने ...फिर अपने बच्चों में ही रम गई। माँ बनी ...फिर दादी बनी। अब जब वही सब मेरी पोती के साथ दोहराया गया तो सालों बाद दर्द की सारी परतें फिर उघड़ गईं, ज़खम फिर से हरा हो उठा। उसी मुखिया के बिगड़े सपूत ने म्हारी फूल-सी पोती को मसल डाला। यह तो बेचारी अभी इन सबका मतलब भी न जाने थी। क्या होवे हैं आदमी-औरत के रिश्ते ...कैसी होवे है तन की भूख ...कुछ भी तो न जाने थी। उम्र ही क्या है अभी इसकी, दस बरस की ही तो है अभी म्हारी छोरी। दस बरस में वो क्या जानती तन के खिलवाड़ ...जिस्म के नोच-खंसोट। कजरी मन-ही-मन अपना जी कड़वा किये जा रही थी और सामने बैठी उसकी पोती फुलवा डलिया बिन रही थी।
महीने-भर पहले गाँव के मुखिया के छोरे ने फुलवा की इज्ज़त को तार-तार कर दिया था। घर आकर बहुत रोई बेचारी बच्ची। वह नादान तो अब तक ना समझ पा रही थी कि ‘आखिर उसके साथ ये हुआ क्या है !’
जब फुलवा छोटी-सी थी, तभी से खूब मार खाती आई थी। अपने बापू से खूब पिटती थी। उसकी माँ भी कभी-कभार उसे झाड़ू या चिमटे से पीट देती। बड़ी अम्मा (कजरी) बस चिल्लाकर ही रह जातीं, एक वो ही थीं, जो उसे कभी पीटतीं न थीं। ...यहाँ तक कि उसका छुटका भाई भी जो हाथ आए वही फुलवा पे दे मारता था। इसलिए बचपन से ही मार-पिटाई सहने की खूब आदत थी फुलवा को। उसने देखा था कि जब उसके बापू को छुटके पर खूब गुस्सा आता तो वह उसकी बुशर्ट उतार कर नंगी पीठ पर मारता। इससे छुटके को खूब लगती ...सीधे चमड़ी पे। लेकिन फुलवा इस बात पर बड़ी हैरान होती कि उसकी माँ तो निरीह गाय-सी, पूरे दिन चुपचाप घर भर के काम करती रहती है ...किसी के भी साथ कोई फूटे बोल पलट के भी न बोलती है ...फिर काहे को उसका बापू हर दूसरे तीसरे दिन आधी रात को उसकी माँ का बदन उघाड़ कर पीटता है ! दबोचता है ! कचोटता है ! काहे बेचारी पे चढ़ बैठता है और वह सिसकती रह जाती है ...बस यही बात फुलवा नहीं समझ पाती थी।
एक दिन फुलवा अपनी बनाई टोकरियाँ सिर पर धरकर पगडंडियों और खेतों से होती हुई मंडी की तरफ चली जा रही थी। रास्ते में मुखिया जी का छोरा मिल गया। बोला – “फुलवा ! कहाँ ले जा रही है ये टोकरियाँ ? एक-आध म्हारे घर भी पहुँचा दे। अम्मा खुश हो जाएगी। ”
“भाईसा ! अपने पसंद के रंग और दाम बताओ। मैं कल ही बीन के हवेली पहुँचा दूँगी। ”
“जे बात ! तीन रंग-बिरंगी टोकरीं बीन के हवेली पहुँचा देना और उनके दाम इसी टेम यहीं पे आके म्हारे हाथों से ले जाना। "
‘हाँ’ में सिर हिलाकर फुलवा मंडी को चल दी। वह किसी से भी ज्यादा बोलती चालती ना थी। स्वभाव से वह अपनी माँ पर ही गई थी। काम से काम बस ! न ज्यादा किसी से बोलना ...न ही बिना काम कहीं घूमना-फिरना। फुलवा उस दिन शाम ढले बाज़ार से लौटी, घर पहुँची और चटपट रंगबिरंगी टोकरियाँ बुनने बैठ गई। घर के बाकी लोग भी यह जानकर खूब खुश हुए कि हवेली में टोकरियाँ जावेंगी तो दाम भी अच्छे मिलेंगे। फुलवा अगले दिन बाजार न गई। दिन भर टोकरियाँ बीनती रही। सांझ तक तीन टोकरियाँ बनाकर हवेली पहुँचाने चल दी। हुकुम टोकरियों को देखकर बड़ी खुश हुईं और उन्होंने फुलवा को उनके दाम चुका दिए। जब फुलवा घर लौट रही थी तो गन्ने के घने खेतों के बीच मुखिया के छोरे ने उसे अपनी और घसीट लिया।
“क्यों री ! तूने अम्मा से पैसे क्यों लिए, मैंने कहा था न कि मैं दूँगा। ”
“मालकिन ने दे दिए तो मैं काईं करती भाईसा ?” उसने कसमसाते हुए और खुद को उसके चंगुल से छुड़ाते हुए कहा।
“लेकिन इब म्हने भी देने का मन है ...फुलवा मैं काईं करूँ ? इब म्हारे से भी ले ...।”
फुलवा हाथ जोड़कर माफी माँगती रही... रोती रही ...लेकिन उसके तन से एक-एक कपड़ा उतरता गया। नादान बच्ची अब तक यही सोचती रही कि जैसे मेरा बापू छुटके को (कभी भी) और माँ को (आधी रात को) कपड़े उतार कर पीटता है वैसे ही छोटे मालिक भी पीटेंगे ...और वह मासूम लड़की कुचली जाती रही, मसली जाती रही। जो फुलवा के साथ हो रहा था, वह उसका मतलब भी नहीं समझती थी। बस वह इतना ही जानती थी कि इससे पहले कभी किसी ने उसे इस तरह से नहीं पीटा है। उसकी जांघों के बीच से खून रिस रहा था। तन का हर हिस्सा दुख रहा था। वह समझ ही न पा रही थी कि उसे मारा गया है कि रौंदा गया है। वह इस उम्र में बलात्कार के मायने ही कहाँ जानती थी !
रात होने को आई थी, आसमान धुंधलका हो चला था। फुलवा के मन के भीतर भी गहरी दुविधा मची थी, वह मासूम अब तक इसी ऊहापोह में थी कि छोटे मालिक ने उसका बदन उघाड़ के उसे क्यों पीटा ? क्या उन्हें टोकरियों के रंग पसंद नहीं आए ? ...या मैंने बड़ी मालकिन से पैसे ले लिए क्या इस कारण से नाराज़ हो गए ? ... बेचारी जैसे-तैसे उठी, खुद को समेटा और कराहती हुई घर चल दी। माँ की नज़र ज्यों ही बच्ची पर पड़ी वह दौड़ पड़ी और अपनी कोखजाई को आंचल में छुपाकर कोठरी के भीतर खींच लाई। माँ रोती जाती थी और फुलवा को बाहों में भींचती जाती भी। 



---------आगे की कहानी पढने के लिए क्लिक करें --------

स्टेटमेंट New Window
Author :. रश्मि | Views :. 494 | Publish Date :. 7/JAN/2015
Tags :. कहानी 
Link To Copy :. http://www.srijangatha.com/Kahani7Jan2015



शनिवार, 28 मार्च 2015

प्रेम

प्रेम ...कहाँ है प्रेम!
बहुत खोजा है उसको
क्या पता कहाँ है
पंछियों की चहक में ढूँढा
तितली के रंगो में तो नहीं
...भँवरे की गुंजन में?
नहीं...नहीं...
तो ?
असीम आकाश में
या सागर की गहराई में
नहीं नहीं...फूलों की खुशबू में होगा!
प्रेम ...कहाँ है प्रेम!
बहुत खोजा है उसको
क्या पता कहाँ है
तेरी मुस्कान में ढूंढा
तेरी मीठी बातों में तो नहीं
...छलकते प्यार में?
नहीं ...नहीं ...
तो ?
बाहों के घेरे में
या कि आँखों के गहरे में
नहीं नहीं...तुम्हारे होठों पर होगा !
प्रेम ....कहाँ है प्रेम
बहुत खोजा है उसको
क्या पता कहाँ है
एक शाम तन्हा ...गहरी सी
बैठ गई मैं
उस शाम के आँचल में सिर को छुपा
तेरी सूरत
उतर आई थी आँखों में
तेरे ख्याल से छलक आईं दो बूंदें
तुम ढलक ना जाओ
ये सोचकर थाम लिया
उन्हें अपनी हथेली पर ।
आह ! ...जिसे खोजा था दर दर
न जाने कहाँ कहाँ
वो प्रेम मेरे नयनों में ही था
इन्हीं दो बूँदों में
...तुम्हीं हो वो
बस गए हो अब मुझमें
सदा सदा के लिए ।— रश्मि
------------------------------

गुरुवार, 26 मार्च 2015

एक जिहादी की प्रेम कहानी

एक जिहादी की प्रेम कहानी

प्रकाशन :2/16/2015
रश्मि
“नहीं ! मेरा बेटा आतंकवादी नहीं हो सकता। वह तो खुद ही इतना डरपोक था कि रसोई के चाकू तक को संभाल कर पकड़ता था, वह बम कैसे पकड़ सकता है ! ...ज़रूर आप लोगों को कोई ग़लतफ़हमी हुई है। ”
“अरी अम्मा ! तेरा बेटा क्या डरेगा बम और चाकू से ...वह तो खुद ही एक मानव-बम था। ”
“नहीं ! नहीं ! ऐसा नहीं हो सकता !”
असलम की अम्मी रोती जाती थी और पुलिस के सामने अपने बेटे की पैरवी करती जाती थी।
“ऐसा ही हुआ है अम्मा। कल तुम्हारे बेटे ने शहर में बम लगा रखे थे। शाम को ही सब एक के बाद एक फटने थे, लेकिन भला हो उस लड़की का जिसने सही वक्त पर हमें खबर कर दी और हमने सारे बम खोज-खोजकर डिफ्युज़ कर दिए। ”
“मेरा असलम ...उसे मार डाला सबने ...” और वह बुढ़िया माँ अपने बेटे की तस्वीर को सीने से लगाए दहाड़ मार कर रोने लगी।
“तेरा असलम मानव-बम बनकर घूम रहा था ...खुद को ही उड़ा लिया उसने ...बाकी के चार दूसरे आतंकवादी भी मारे गए। ” पुलिस इंस्पेक्टर बुढ़िया को जानकारी दे रहा था इसी बीच इन्वेस्टीगेशन कर रहे एक अधिकारी ने पीक थूकते हुए हिकारत से कहा – “अच्छा हुआ कि मर गए स्साले। कुछ तो बोझ कम हुआ धरती का। ”
बुढ़िया बेटे की तस्वीर को सीने से लगाए रोए जा रही थी और पुलिस उसके घर की तलाशी ले रही थी। असलम के कमरे से उसे एक एके 47 और कुछ कोकीन मिला।
“कैसी भोली बन रही थी ...कहती थी कि मेरा असलम रसोई के चाक़ू तक से डरता था ...तो क्या इस बंदूक से तू खेलती थी। ” फिर बाकी लोगों की तरफ देखकर बोला – “चलो ओए ! समेटो ये सब ...ले चलो ये सब थाने। इस माई को भी ले चलो। जब तक ये केस नहीं सुलटता तब तक न जाने क्या-क्या पूछना पड़े इससे। ”
असलम अपने अम्मी-अब्बू की पाँचवी और आखिरी औलाद था। वह बचपन से ही पढ़ने-लिखने और बातचीत में निहायत ज़हीन था। जो भी उससे मिलता, उसके व्यवहार पर फ़िदा हो जाता। अपने स्कूल में तो वह सभी का चहीता था। चाहे गाना हो या नाचना, ड्रामा हो या खेलकूद सभी में असलम की डिमाण्ड रहती। उसके बिना मानो हर टीम अधूरी रहती। पढ़ाई में भी उसके और सिमरन के बीच मुक़ाबला बना रहता। कक्षा में कभी असलम अव्वल आता तो कभी सिमरन। इन दोनों के रहते कोई भी पहली और दूसरी पोजीशन पर कब्ज़ा नहीं जमा पाया। स्कूल से बाहरवीं पास करने के बाद असलम ने कम्प्यूटर साइंस ले लिया। वह सॉफ्टवेयर की दुनिया में नए-नए ईजाद करना चाहता था। उसका दिमाग वाकई किसी कम्प्यूटर की तरह ही काम करता था। जल्दी ही असलम अपने कॉलेज का भी हीरो बन गया। हर कोई उससे दोस्ती करना चाहता। लड़कियाँ उसके साथ ही अपने नोट्स शेयर करतीं, बदले में वह भी उनका भरोसेमंद और मददगार था। किसी को भी, कैसी भी ज़रूरत आन पड़े, असलम हमेशा हाज़िर रहता।
वही असलम जिहादी कैसे बन गया ! जो हर इंसान से प्यार करता था ...जो दोस्ती की मिसाल था ...दानव कैसे बन गया ! ऐसा क्या हुआ उसकी ज़िन्दगी में कि अपनी उँगलियों के बीच कलम थामने वाला और कीबोर्ड पर उँगलियाँ नचाने वाला, सबका प्यारा, यारों का यार असलम, अपनी उन्हीं उँगलियों से एके 47 के ट्रिगर दबाने लगा !
इस केस की खासी तहकीकात हुई ...गुप्त छानबीन की गई। फिर जो बात सामने निकल के आई वो कुछ यूँ थी –
असलम जब कॉलेज में था तब उसकी दोस्ती रेहान से हुई। रेहान बुद्धिमान तो था ही साथ ही बेहद तेज़ तर्रार भी था। वह असलम की तरह बड़े दिल का नहीं था, उसके दिल में हिन्दुओं के प्रति बेइंतिहा कड़वाहट थी और असलम से दोस्ती करने का वह एक ही मकसद बताता था कि – “तू अल्लाह पाक की औलाद है ...मेरा जात-भाई है। ” ...हालांकि असलम जांति-पांति और धर्म-सम्प्रदाय के ओछे आडम्बरों से दूर ही रहता था। वह अपने दोस्तों के साथ हर त्यौहार खुल कर मनाता था और सभी धर्म-जातियों का सम्मान करता था। ...लेकिन रेहान से दोस्ती करने के बाद असलम के व्यवहार में धीरे-धीरे ही सही, बदलाव आना शुरू हो गया। वह असलम जो अपनी अम्मी के लाख कहने के बावज़ूद मस्जिद न जाता था, अब हर जुम्मे के जुम्मे मस्जिद जाने लगा। धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती ने ज़ोर पकड़ लिया। घर आना-जाना भी शुरू हुआ और तभी असलम की ज़िन्दगी में आई रेहान की चचेरी बहन सोहा। सोहा उसी शहर में एक फ्लैट किराए में लेकर रह रही थी। वह नौकरी करती थी और प्राइवेट पढ़ भी रही थी। बेहद खूबसूरत और मिलनसार। वह अक्सर रेहान के घर वालों से मिलने उसके घर आया करती थी। तभी उसकी मुलाक़ात असलम से भी हुई। धीरे-धीरे यह मुलाकत बाहर भी होने लगी ...फिर बढ़ने लगी ...और आखिर में वे दोनों एक दूसरे के सबसे करीब आ गए।
अब अक्सर रेहान, असलम और सोहा साथ-साथ घूमते। रेहान असलम और सोहा की नज़दीकियों से वाकिफ़ हो चुका था। वह उन्हें और करीब आने के मौके देने लगा। यह दोस्ती बेहद गहरी होती चली गई। असलम बदल रहा था ...उसकी एक डोर रेहान के हाथ में थी तो दूसरी सोहा के। वे जैसे चाहते उसे घुमाते। ...और वह किंकर्तव्यविमूढ़-सा वही करता जा रहा था जो वे दोनों चाह रहे थे।
“असलम ! तू भी मस्जिद के पीछे वाले चबूतरे पर चला कर। वहाँ के मौलवी साहब दुनियादारी की बड़ी सलीकेदार बातें सिखाते हैं। ज़िन्दगी में यह सब जानना भी तो ज़रूरी है दोस्त !” असलम अक्सर रेहान के साथ उन चबूतरों पर जाने लगा। मौलवी साहब सबको इकठ्ठा करके हदीसें सुनाया करते ...अल्लाह की नज़र में क्या हलाल है और क्या हराम, बताया करते। यूँ भी असलम बेहद कोमल और तहज़ीबदार स्वभाव का था इसिलए उसे इन बातों में रस आने लगा। धीरे-धीरे वह वहाँ अक्सर जाने लगा। असलम नहीं समझ पा रहा था कि रेहान उसे किस राह पर ले जा रहा है। लेकिन रेहान अब तक असलम के स्वभाव को बखूबी बाँच चुका था। वह उसे धर्म के रास्ते जिहाद की ओर लिए जा रहा था क्योंकि असलम जैसे लड़के को इसी रास्ते से ले जाया जा सकता था। रेहान उसे मस्जिद के पीछे की ओर बने एक आतंकी अड्डे की ओर धकेलना चाहता था। यह अड्डा बेग का था। बेग यहाँ दो कमरों के एक पुराने से घर में रह रहा था और छुप-छुपकर अपनी गतिविधियों को अंजाम देता रहता था। रेहान उसका राइट-हैंड था।
रेहान ने असलम की मुलाक़ात अपने दोस्त बेग से करवाई। बेग ने पहली ही मुलाक़ात में अपनी मीठी-मीठी और लच्छेदार बातों से असलम को अपना बना लिया। ...फिर धीरे-धीरे नशा देकर उसके दिमाग को सुन्न करना शुरू किया। ...और आखिर में जब असलम का दिमाग और सोच सुन्न पड़ने लगे तब बेग ने अपने विचारों को उस पर रोपना शुरू किया। धीरे-धीरे वह असलम के विचारों को अपने सांचे में ढालने लगा। जब कभी बेग को अपने इस काम में रुकावट महसूस होती तो वह सोहा का सहारा लेता। सोहा बड़े प्यार से असलम का हाथ पकड़ती और कहती – “बेग भाई ठीक ही तो कह रहे हैं असलम। ” ...और धीरे-धीरे आलम ये हो गया कि वह असलम जो अब तक पूरे देश के बारे में सोचता था, एक कौम तक ही सिमट कर रह गया ...वह असलम जो इंसानियत को पूजता था, जिहाद को जायज़ मानने लगा।
असलम धीरे-धीरे सबसे कट गया। अब उसका चबूतरे और मौलवी साहब से भी कम ही वास्ता रहता। वह हर वक्त बेग के पास ही पड़ा रहता। सोहा भी अक्सर उसके साथ रहती। असलम ने कॉलेज जाना तो कब का बंद कर दिया था, अब अपने घर भी कम ही जाने लगा। अक्सर रातें भी सोहा के फ्लैट में ही गुज़ारने लगा। जब अम्मी ने घर न आने की वजह पूछी तो बोला - “एक नौकरी मिली है, उसी के सिलसिले में शहर से बाहर जाना पड़ता है। ”
उसे होश ही न था कि उसके दिल और दिमाग में जिहाद का बारूद भरता जा रहा है।


आगे पढ़ें -------------

गुरुवार, 19 मार्च 2015

ईर्ष्या

एक बूढ़ा किसान अपने चबूतरे पर उदास बैठा था। किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई-" काका! तुम्हारा पूरा खेत बरसात में चौपट हो गया ।"
बुढ़े किसान ने पूछा- "हरिया का? "
"काका! उसका भी बर्बाद हो गया।"
"...और रामू का, लखने का?"
"काका! इस बरसात में हम सबके खेत चौपट हो गए।"
बूढ़े ने ठंडी साँस भरी और मन ही मन कहा 'फिर ठीक है'
————————
यही स्थिति है हमारे भीतर मौज़ूद "ईर्ष्या" की। हम जले जा रहे हैं, मिट रहे हैं समाप्त हो रहे हैं। उस पर भी इस बात से संतुष्ट हैं कि चलो अच्छा है कि अपनी बिगड़ी तो बिगड़ी लेकिन पड़ोसी की भी न बची। इस ईर्ष्या के चलते हम अपने तन-मन-आत्मा सबका बिगाड़ कर लेते हैं।

जीवन काँटे-सा चुभने के लिए नहीं है मित्रों । ...फूल-सा खिलने के लिए है; महकने और महकाने के लिए है।— आपकी रश्मि

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

STATMENT

स्टेटमेंट

प्रकाशन :1/7/2015
रश्मि
ल छोरी ! मंदिर चल म्हारे साथ। थारा जी बहल जावेगा। ”
“मन्ने नी जाना। ”
कजरी जानती थी कि उसकी पोती जिस हादसे से निकली है, उसके ज़ख्म इतनी आसानी से नहीं भरने वाले। कभी वह खुद भी तो इस ज़ख्म से अपने तन-मन को छलनी कर चुकी थी इसलिए अपनी पोती के दर्द को बखूबी समझ सकती थी। वह तो फिर भी सोलह-सत्रह बरस की थी लेकिन उसकी फुलवा ...उसकी पोती वह तो अभी दस ही बरस की है और इतना बड़ा वज्र सह गई। कजरी को अपना लड़कपन याद हो आया। सोलह-सत्रह की ही रही होगी वो, जब गौना होकर अपने सासरे लौटी थी। ...और अपने ही गाँव के मुखिया की बदनियती का शिकार बन गई थी।
उसकी मुँह दिखाई के दिन की बात है, जब पूरे गाँव की लुगाइयाँ उसके आँगन में जुड़ आईं थीं तब सास ने सबके सामने कहा था – “बहुरिया ! पूरे गाँव ने अपना ही घर मानिजो। यहाँ सब तेरे अपने ही रिश्ते-नातेदार हैं। कोई तेरी माँ समान है तो कोई तेरी भाभी समान ...कोई तेरी बहन सरीखी है तो कोई तेरी सहेली-सी। बीनणी ! तू सबने अपना पिता और भाई मानिजो। ”
मैंने भी हामी में अपना सर हिलाया था ...और सच भी था, मुझे पूरे गाँव का प्यार मिला। इतना प्यार कि अपने पीहर की भी सुध न रही थी। जो जो रिश्ते वहाँ पीहर में बिछुड़े, वो सब यहाँ सासरे में मिल गए थे। इन्हीं सब अच्छे लोगों के बीच एक इंसान, उसकी नियत कब बदल गई ...कि राम जाने वह पहले से ही ऐसा ही था, पता ही न चला। वह इंसान था म्हारे ही गाँव का मुखिया। मैं उसके आगे लाख गिड़गिड़ाई ...हाथ जोड़के मिन्नतें कीं ...अपने पेट से होने की दुहाई दी ...लानतें दीं ...तड़फी ...मचली और फिर सिसकती ही रह गई। मैं अपने दर्द को जिस्म में लिए आत्मा के भीतर दबा गई। मुखिया की धमकी और लोकलाज के भय से किसी के भी आगे अपना मुँह न खोला और साल दर साल बीतते गए। वह निगोड़ा मुखिया भी दूसरे ही बरस बीमारी के चलते राम जी को प्यारा हो गया। ...और मैं बड़े जतन करके उस काली याद को किसी अँधेरे कुएँ में दफना आई थी और अपनी आगे की ज़िन्दगी सँवारने लगी।
धीरे-धीरे समय बीता ...सात बच्चे जने ...फिर अपने बच्चों में ही रम गई। माँ बनी ...फिर दादी बनी। अब जब वही सब मेरी पोती के साथ दोहराया गया तो सालों बाद दर्द की सारी परतें फिर उघड़ गईं, ज़खम फिर से हरा हो उठा। उसी मुखिया के बिगड़े सपूत ने म्हारी फूल-सी पोती को मसल डाला। यह तो बेचारी अभी इन सबका मतलब भी न जाने थी। क्या होवे हैं आदमी-औरत के रिश्ते ...कैसी होवे है तन की भूख ...कुछ भी तो न जाने थी। उम्र ही क्या है अभी इसकी, दस बरस की ही तो है अभी म्हारी छोरी। दस बरस में वो क्या जानती तन के खिलवाड़ ...जिस्म के नोच-खंसोट। कजरी मन-ही-मन अपना जी कड़वा किये जा रही थी और सामने बैठी उसकी पोती फुलवा डलिया बिन रही थी।
महीने-भर पहले गाँव के मुखिया के छोरे ने फुलवा की इज्ज़त को तार-तार कर दिया था। घर आकर बहुत रोई बेचारी बच्ची। वह नादान तो अब तक ना समझ पा रही थी कि ‘आखिर उसके साथ ये हुआ क्या है !’
जब फुलवा छोटी-सी थी, तभी से खूब मार खाती आई थी। अपने बापू से खूब पिटती थी। उसकी माँ भी कभी-कभार उसे झाड़ू या चिमटे से पीट देती। बड़ी अम्मा (कजरी) बस चिल्लाकर ही रह जातीं, एक वो ही थीं, जो उसे कभी पीटतीं न थीं। ...यहाँ तक कि उसका छुटका भाई भी जो हाथ आए वही फुलवा पे दे मारता था। इसलिए बचपन से ही मार-पिटाई सहने की खूब आदत थी फुलवा को। उसने देखा था कि जब उसके बापू को छुटके पर खूब गुस्सा आता तो वह उसकी बुशर्ट उतार कर नंगी पीठ पर मारता। इससे छुटके को खूब लगती ...सीधे चमड़ी पे। लेकिन फुलवा इस बात पर बड़ी हैरान होती कि उसकी माँ तो निरीह गाय-सी, पूरे दिन चुपचाप घर भर के काम करती रहती है ...किसी के भी साथ कोई फूटे बोल पलट के भी न बोलती है ...फिर काहे को उसका बापू हर दूसरे तीसरे दिन आधी रात को उसकी माँ का बदन उघाड़ कर पीटता है ! दबोचता है ! कचोटता है ! काहे बेचारी पे चढ़ बैठता है और वह सिसकती रह जाती है ...बस यही बात फुलवा नहीं समझ पाती थी।
एक दिन फुलवा अपनी बनाई टोकरियाँ सिर पर धरकर पगडंडियों और खेतों से होती हुई मंडी की तरफ चली जा रही थी। रास्ते में मुखिया जी का छोरा मिल गया। बोला – “फुलवा ! कहाँ ले जा रही है ये टोकरियाँ ? एक-आध म्हारे घर भी पहुँचा दे। अम्मा खुश हो जाएगी। ”
“भाईसा ! अपने पसंद के रंग और दाम बताओ। मैं कल ही बीन के हवेली पहुँचा दूँगी। ”
“जे बात ! तीन रंग-बिरंगी टोकरीं बीन के हवेली पहुँचा देना और उनके दाम इसी टेम यहीं पे आके म्हारे हाथों से ले जाना। "
‘हाँ’ में सिर हिलाकर फुलवा मंडी को चल दी। वह किसी से भी ज्यादा बोलती चालती ना थी। स्वभाव से वह अपनी माँ पर ही गई थी। काम से काम बस ! न ज्यादा किसी से बोलना ...न ही बिना काम कहीं घूमना-फिरना। फुलवा उस दिन शाम ढले बाज़ार से लौटी, घर पहुँची और चटपट रंगबिरंगी टोकरियाँ बुनने बैठ गई। घर के बाकी लोग भी यह जानकर खूब खुश हुए कि हवेली में टोकरियाँ जावेंगी तो दाम भी अच्छे मिलेंगे। फुलवा अगले दिन बाजार न गई। दिन भर टोकरियाँ बीनती रही। सांझ तक तीन टोकरियाँ बनाकर हवेली पहुँचाने चल दी। हुकुम टोकरियों को देखकर बड़ी खुश हुईं और उन्होंने फुलवा को उनके दाम चुका दिए। जब फुलवा घर लौट रही थी तो गन्ने के घने खेतों के बीच मुखिया के छोरे ने उसे अपनी और घसीट लिया।
“क्यों री ! तूने अम्मा से पैसे क्यों लिए, मैंने कहा था न कि मैं दूँगा। ”
“मालकिन ने दे दिए तो मैं काईं करती भाईसा ?” उसने कसमसाते हुए और खुद को उसके चंगुल से छुड़ाते हुए कहा।
“लेकिन इब म्हने भी देने का मन है ...फुलवा मैं काईं करूँ ? इब म्हारे से भी ले ...।”
फुलवा हाथ जोड़कर माफी माँगती रही... रोती रही ...लेकिन उसके तन से एक-एक कपड़ा उतरता गया। नादान बच्ची अब तक यही सोचती रही कि जैसे मेरा बापू छुटके को (कभी भी) और माँ को (आधी रात को) कपड़े उतार कर पीटता है वैसे ही छोटे मालिक भी पीटेंगे ...और वह मासूम लड़की कुचली जाती रही, मसली जाती रही। जो फुलवा के साथ हो रहा था, वह उसका मतलब भी नहीं समझती थी। बस वह इतना ही जानती थी कि इससे पहले कभी किसी ने उसे इस तरह से नहीं पीटा है। उसकी जांघों के बीच से खून रिस रहा था। तन का हर हिस्सा दुख रहा था। वह समझ ही न पा रही थी कि उसे मारा गया है कि रौंदा गया है। वह इस उम्र में बलात्कार के मायने ही कहाँ जानती थी !
रात होने को आई थी, आसमान धुंधलका हो चला था। फुलवा के मन के भीतर भी गहरी दुविधा मची थी, वह मासूम अब तक इसी ऊहापोह में थी कि छोटे मालिक ने उसका बदन उघाड़ के उसे क्यों पीटा ? क्या उन्हें टोकरियों के रंग पसंद नहीं आए ? ...या मैंने बड़ी मालकिन से पैसे ले लिए क्या इस कारण से नाराज़ हो गए ? ... बेचारी जैसे-तैसे उठी, खुद को समेटा और कराहती हुई घर चल दी। माँ की नज़र ज्यों ही बच्ची पर पड़ी वह दौड़ पड़ी और अपनी कोखजाई को आंचल में छुपाकर कोठरी के भीतर खींच लाई। माँ रोती जाती थी और फुलवा को बाहों में भींचती जाती भी। बापू, बड़ी अम्मा, छुटका सब उसके जिस्म से बहता खून देख-देखकर रो रहे थे। बड़ी माँ ने इतना ही पूछा था – “छोरी थारा जे हाल किस निपूते ने किया ?” ...और फुलवा के मुँह से ‘छोटे मालिक’ का नाम सुनके उसका बापू जहर बुझे सांप-सा बिलबिला के रह गया था। ...फिर कई दिन तक माँ ने फूलवा की देखभाल की। किसी ने भी उसे घर से बाहर ना जाने दिया।
एक दिन फुलवा के बापू ने आकर कहा – “चल फुलवा, म्हारे साथ चल, उस छोरे की सिकायत मैंने सरपंच जी से की थी। सरपंच जी थारा सटेटमेंट लेवेंगे। वे जो भी पूछें सच्ची-सच्ची कह देना, सरमाना मत छोरी ...और ना ही घबराना। मैं तो उस दरिन्दे को कोरट-कचहरी तक खींचूँगा। बड़े होंगे तो अपने घर के। जेल की हवा न खिला दी तो ...।”
फुलवा सिर झुकाए बापू के पीछे-पीछे चल दी। सरपंच ने बच्ची के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और कमरे के भीतर ले गए। अकेले में बड़े प्यार से उसका बयान लिया और उसके बापू को दो-तीन दिन बाद फिर आने की कह कर वापस भेज दिया। तीन दिन के बाद विधायक जी ने खुद उसे और फुलवा को हवेली में बुलवा भेजा। फुलवा का बापू समझ गया कि यह सब उसकी शिकायत का ही असर है और अब तो ज़रूर उस छोरे को सजा हो ही जावेगी। वह बेटी को लेकर विधायक की ड्योढ़ी पर पहुँचा।
“राधे ! मैं बच्ची से अकेले में बात करना चाहूँ हूँ। ” ...और वह फुलवा को भीतर ले गया। बड़े प्यार से उसके तन पर हाथ फेर-फेर के बयान लेता रहा।
यूँ ही दो हफ्ते बीत गए। फुलवा की अम्मा ने उसके बापू को खूब समझाया कि, "बेटी की जात है, मत करो जिद्द ...इन ऊँची हवेली वालों को कोई सजा न होवेगी बल्कि हमारी ही इज्जत खाक में मिलती जावेगी। बिटिया के जखम हम मिलके भर देवेंगे। काहे बार-बार सबके सामने अपनी ही इज्जत को उघाड़ना। कोई बयान लेवेगा, कोई गवाही, तो कोई सटेटमेंट ...गरीब की कब कौन सुनता है ...हमें कब मिला है न्याय जो अब मिलेगा। ”


मित्रों ! आगे की कहानी पढ़ने के लिए क्लिक करें

http://www.srijangatha.com/Kahani7Jan2015



सोमवार, 12 जनवरी 2015

खोज परिणाम (Search Result) साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच

खोज परिणाम (Search Result) साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच





प्रिय मित्रों ! आज जिस तरह से महिलाएँ और ख़ासकर मासूम बच्चियाँ बलात्कार नाम के खौफनाक कृत्य का शिकार बन रही हैं, वह शर्मनाक है | इस विषय पर मेरी नई लिखी कहानी पढ़िए और अपने विचार एवं सुझाव दीजिए |
सृजनगाथा.कॉम पर मेरी कहानी को स्थान मिला इसके लिए मैं आदरणीय सम्पादक महोदय और उनकी पूरी टीम को सादर धन्यवाद देती हूँ | -आपकी रश्मि