शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

जब मंजिलें पड़ाव बन जातीं हैं


आप सोच रहे होंगे कि ये तो उल्टी बात है ! भला मंजिलें भी कभी पड़ाव हुआ करतीं हैं! इन मंजिलों को ही तो पाने के लिए हम सब इतनी भाग-दौड़, आफत किए रहते हैं ! हम अक्सर सुनते हैं कि, ‘हर जीवन में अपनी एक मंजिल होनी चाहिए’ ‘हमें हमेशा अपने मकसद को पूरा करना चाहिए’ ‘हमें अपना मुकाम हासिल करने के लिए जुट जाना चाहिए’ आदि आदि | हमें अपने बड़ों से ये सब अक्सर सुनने को मिलता रहता है और हम अपने से छोटों को अमूमन हर रोज़ ऐसी ही सलाह देते हैं |

किन्तु ज़रा ध्यान दीजिए – क्या वाकई कोई मंजिल होती है ? क्या वाकई कोई ऐसा मुकाम है जहाँ जाकर हमारी सारी कोशिशें ख़त्म हो जातीं हैं ? मैंने तो ऐसा नहीं पाया | आप भी ध्यान दीजिए | मैंने तो यही पाया है कि हम सभी के जीवन में अनेक रास्ते होते हैं और हम अपने लिए एक मंजिल तय कर लेते हैं | फिर हम उस तयशुदा मंजिल को पाने के लिए किसी एक रास्ते पर चल देते हैं | ये रास्ता कहीं-कहीं पर ऊबड़-खाबड़ है, झाड़-झंखाड़ और काँटों से भरा है, पैरों के तलवों में चुभता है और उन्हें छील-छील देता है | कभी-कभी यही रास्ता पैरों तले हरी मखमली कालीन बिछा देता है | हम पल भर को चिड़ियों की चहक में, सागर से गीली हो आई नर्म-मुलायम रेत में आनन्द लेते हुए आगे की ओर बढ़ने लगते हैं | (अक्सर कुछ लोग इन रास्तों की चुभन या नरमी में अपनी मंजिल को भूलकर रास्ते से भटक भी जाते हैं) ...ख़ैर....यह रास्ता निरंतर आगे को बढ़ता रहता है, हम चलते जाते हैं, बिना थमे आगे बढ़ते जाते हैं | कभी-कभी पीछे मुड़कर देखते हैं तो आश्चर्य होता है कि ‘हम अपनी मंजिल को पाने के लिए इतना लम्बा सफर तय करके कितने आगे तक निकल आए हैं !’

तभी हमें सामने अपनी मंजिल करीब नज़र आने लगती है और हम उस ओर बेतहाशा दौड़ पड़ते हैं | अब पैरों के तले काँटे आ रहे हैं कि दूब बिछ रही है, कोई फर्क नहीं पड़ता...एहसास ही नहीं रहता क्योंकि निगाह सिर्फ मंजिल पर है | क्योंकि इसी के लिए ही तो यहाँ तक आए थे | ...और अंतत: हम अपनी मंजिल तक पहुँच जाते हैं | कुछ देर का ठहराव....असीम आराम....हम यहाँ बैठ जाते हैं | ‘बस ! यही तो पाना चाह रहे थे’ ऐसा सोचकर वहीँ ठहर जाते हैं | लेकिन आश्चर्य ! कुछ ही देर बीती थी कि फिर इधर-उधर निगाह दौड़ाते हैं | किसी और दिशा में देखने लगते हैं | फिर अनेक राहें नज़र आने लगतीं हैं...ये राहें भी आकर्षित करने लगतीं हैं...एक और मकसद दिखने लगता है | ज़रा से देर के आराम के बाद ही हम फिर उठ खड़े होते हैं और अब उस नई दिशा में दौड़ लगा देते हैं ......अब ये पाना है ....अब यहाँ पहुँचना है | इसी तरह पूरे जीवन अनेक रास्तों पर चलते-चलते अनेक पड़ावों पर अपने निशान छोड़ते जाते हैं | ये वही पड़ाव हैं जिन्हें हम दूर से मंजिल समझ रहे थे | .....और अंततः ऐसे ही किसी पड़ाव पर थक कर हमेशा-हमेशा के लिए सो जाते हैं |

मित्रों ! जीवन में रास्ते होते हैं, पड़ाव होते हैं, ठहराव होते हैं लेकिन मंजिल कभी नहीं होती | जहाँ सफर ख़त्म हो जाए वहीँ मंजिल है, किन्तु ऐसा कभी नहीं होता और एक के बाद दूसरी राह मिलती ही रहती है ....चुनौतियाँ आती ही रहतीं हैं | जो जीवन मिला है वो बड़ा ही खूबसूरत है | अपना रास्ता चुन लीजिए और चल दीजिये | फिर चाहें काँटे आएँ या दूब रुकियेगा मत | - आपकी रश्मि   

         

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

अपने भीतर के रावण को मारना होगा

मित्रों आज एक चर्चा में जाना हुआ | यह एक साहित्यिक चर्चा थी और इसमें काव्य के विविध रूपों को प्रस्तुत किया गया, विविध छंदों पर प्रकाश डाला गया | इस चर्चा में लंका कांड को भी नाट्य प्रस्तुति दी गई | आप सोच रहे होंगे कि इसमें ख़ास बात क्या है ? मैंने ये चर्चा आप सभी से क्यों कर रही हूँ ? दरअसल जब लंका कांड का मंचन चल रहा था तो 

मैं उस दौरान यह सोच रही थी कि
क्या कारण है कि हमारा समाज रावण जैसे ज्ञानी व्यक्ति को सम्मान नहीं देता !
क्या कारण है कि रावण बलवान होते हुए भी हर साल जलाया जाता है !
क्या कारण है कि सूर्पनखा की खातिर इतना बड़ा युद्ध रच देने वाले भाई के जैसा भाई कोई भी बहन नहीं चाहती !
कहा जाता है कि मंदोदरी स्वयं बहुत ज्ञानी थीं | शतरंज के खेल की शुरुआत उन्हींने ही की थी | रावण के साथ वे इन खेल को खेला करतीं थीं किन्तु फिर भी कोई स्त्री अपने लिए रावण जैसा पति नहीं चाहती !
रावण अपने भाइयों और बेटों से स्नेह करता था, बावजूद इसके कोई भी रावण-सा भाई या पिता नहीं चाहता !
रावण सोने की लंका का मालिक था, अपार संपदा का स्वामी, तब भी कोई जनता रावण जैसा शासक नहीं चाहती !

मित्रों ! यदि रावण के चरित्र को ध्यान से देखा जाए तो वह भी एक साधारण इंसान-सा ही दिखता है | लेकिन हम हर बार रावण का मुक़ाबला श्री रामजी से करके उसके अवगुणों को और भी महिमामंडित करते हैं | जितनी बुराइयाँ रावण में थीं उतनी ही बुराइयाँ हम सब में भी मौजूद हैं | फिर क्या कारण है कि हम अपने भीतर के रावण को कभी नहीं मारते किन्तु उसके प्रतीक को हर साल फूँक डालते हैं | हमें रावण के चरित्र का मूल्यांकन आधुनिक दृष्टि से करना होगा | हमारा समाज रावण जैसे ज्ञानी व्यक्ति को सम्मान इसलिए नहीं देता क्योंकि रावण का ज्ञान समाज के लिए कल्याण का काम नहीं कर रहा था | उसका अपार ज्ञान अभिमान की भेंट चढ़ गया था | यदि ज्ञान का विस्तार न किया जाए तो वह सिमट कर रह जाता है | किसी का कल्याण नहीं कर पाता| इसीलिए हमें रावण के चरित्र से यह सीख लेनी चाहिए कि कभी अपने ज्ञान पर अभिमान न करें | अपना ज्ञान अगली पीढ़ी तक ज़रूर पहुँचाना चाहिए | रावण बलवान होते हुए भी हर साल जलाया जाता है और हमें यह संकेत दे जाता है कि चाहे जितने भी बलवान या सामर्थ्यवान बन जाओ किन्तु जीवन का अंत जरुर होना है | और उस वक्त कुछ भी हमारे साथ नहीं जा सकता | स्त्रियाँ कभी रावण-सा भाई या पति इसलिए नहीं चाहतीं क्योंकि रावण ने पराई स्त्री का अपमान किया था | स्त्रियाँ समाज का आधा महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनका सम्मान पुरुषत्व का सम्मान है अर्थात पूरे समाज के लिए सम्मानजनक | रावण अपने बेटे और भाइयों से स्नेह तो करता रहा किन्तु वह उन्हें जीने का सही ढंग सिखाना भूल गया | वह अपनी अगली जनरेशन को अच्छे संस्कार देना भूल गया | रावण एक योग्य शासक की तरह अपने नागरिकों के भीतर के पशुत्व को समाप्त नहीं कर पाया | अन्य राजा के संधि प्रस्तावों को स्वीकार नहीं कर पाया |

कुल मिलाकर यदि हम देखें तो वाल्मीकि या तुलसीदास द्वारा निर्मित यह चरित्र कभी अपने अभिमान से बाहर नहीं निकल पाया और यही अभिमान उसे अपने हर करीबी से दूर ले गया| अत्यंत ज्ञानी रावण भी अभिमान के चलते समूल मिटा दिया गया |

इसीलिए बार-बार लंका के रावण को जलाने की बजाए एक बार अपने भीतर के रावण को जला दें | बार-बार लंकेश से नफरत करने की बजाए एक बार अपने भीतर की लंका को जलाकर नष्ट कर दें | बार-बार दशानन का सर कलम करने की बजाए एक बार अपने भीतर सर उठाने वाली नफरत और घमंड की बेल को समूल काट कर फेंक दें | एक बार ज़रूर सोचें कि क्यों हम बार-बार रावण से ही नफरत करते हैं लेकिन अपने आप से नहीं! हम उसकी बुराइयाँ खोद खोदकर कर निकालते हैं लेकिन अपनी पालते चले जाते हैं ! बार-बार लगातर लंका के रावण को मार चुके चलिए इस बार अपने भीतर के रावण को मारकर देखें | - आपकी रश्मि

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

बुराइयों से दूर रहें

इस दुनिया में हर चीज़ अस्थाई है, कुछ भी हमेशा के लिए नहीं हैं, ये बात जानते हुए भी व्यक्ति इस संसार की भूल-भुलैया में भटकता रहता है | वह अपने जीवन में सब पा लेना चाहता है और इन्हीं चेष्टाओं में लगा रहता है | जीवन के सुख, वैभव, भोग, विलास, लिप्सा, तृष्णा आदि से कभी भी उसका जी नहीं भरता | यदि कभी-कभी उसे अपनी गलतियों का एहसास होता भी है तो वह बहुत ही अल्पकालीन होता है | संसार के भोग विलास के चंगुल से आसानी से नहीं निकला जा सकता |

एक वाकया है एक रईस था | वह हमेशा ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने, जीवन को ऐश-ओ-आराम से युक्त बनाने तथा विलासिताओं की ओर ही आकर्षित रहता था | लेकिन समय के साथ-साथ उसे एहसास हुआ कि मुझे भी अपना परमार्थ सुधारना चाहिए | आखिर एक दिन मुझे भी यह सब छोड़ छाड़कर ईश्वर के घर जाना है और मैंने अपने जीवन में इतने छल, कपट, अपराध किये हैं कि मुझे तो माफ़ी भी आसानी से नहीं मिल पाएगी |’ उसे अपने द्वारा किये गए बुरे कामों का पछतावा हो रहा था | वह एक धर्मगुरु के पास गया और बड़ी श्रद्धा से उनसे बोला – “गुरुदेव ! मैंने अपने जीवन में अनेक बुरे काम किये हैं | मैं एक व्यवसायी हूँ और मैंने अपने व्यवसाय को और बढाने के लिए अनेक गलत तरीकों का प्रयोग किया | मैं मांस-मदिरा से भी खुद को दूर न रख सका | सुरा और सुंदरी में ही जीवन का रस तलाशता रहा | लेकिन अब मुझे बहुत पछतावा होता है | मैं सभी बुराइयाँ छोड़ना चाहता हूँ | मेरा बेटा बड़ा हो रहा है और मैं नहीं चाहता कि वह भी मुझे देखकर इन बुराइयों को खुद में उतार ले | किन्तु प्रभु मेरी समस्या ये है कि मैं इन कर्मों में इस हद तक लिप्त हो चुका हूँ कि यदि मैं छोड़ना भी चाहता हूँ तो ये मुझे नहीं छोड़तीं | आप मेरी सहायता कीजिए |” गुरु मंद-मंद मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति की बातों को ध्यान से सुन रहे थे | उन्होंने बड़े प्रेम से कहा- ज़रा अपना हाथ तो दिखाओ |” व्यक्ति ने अपना हाथ गुरु को दिखाने के लिए उनकी ओर बढ़ा दिया | गुरु ने अपने चेहरे पर चिंता के भाव लाते हुए कहा- अरे ! तुम्हारी तो उम्र ही बहुत कम बची है | तुम अगले चालीसवें दिन इस संसार में विदा होने वाले हो | इतने कम समय में मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ ! अब तो बेहतर यही होगा कि तुम अपने पुराने कामों को ही निपटाना शुरू कर दो क्योंकि तुम्हारे पास जीने के लिए अब ज्यादा वक्त नहीं है |” वह व्यक्ति गुरु की बात सुनकर बहुत दुखी हुआ | अब वह अपने कारोबार का सभी हिसाब किताब ठीक-ठाक करने लगा | उसने जिसका भी धन रोका हुआ था वो सब देना शुरू कर दिया | अपने बेटे और पत्नी को भी भरपूर समय और स्नेह देने लगा | अपना अधिक से अधिक वक्त दूसरों की भलाई में गुज़ारने लगा | उसे बार बार यह अहसास रहता कि उसके पास अब ज्यादा वक्त नहीं है

जब उनतालीसवां दिन आया तो उसने सोचा- अब मेरे पास एक ही दिन बचा है, तो क्यों न गुरु जी का भी आशीर्वाद ले आऊँ | आखिरकार उन्होंने ही मुझे यह बताया है | यदि वे मुझे ऐसा न बताते तो मैं अपना इतना वक्त भी यूँ ही बर्बाद कर देता |’ इन उनतालीस दिनों में उसका जीवन पूरी तरह से बदल चुका था | अब वह एक नए रूप में अपने गुरु के समक्ष खड़ा था | उसने गुरु को प्रणाम किया और कहा- आपकी आज्ञानुसार मैंने अपने सभी बुरे कामों को काफी हद तक सुधार लिया है | कल मैं इस जीवन से मुक्त हो जाऊँगा अत: आज आपके दर्शनों के लिए आया हूँ |” गुरु ने उसे प्रेम से अपने नज़दीक बैठाया और समझाया- तुम्हारा पुराना जीवन तो कब का ख़त्म हो चुका है और नया जीवन शुरू भी हो चुका है | सच तो ये है कि मुझे तुम्हारी मृत्यु की कोई निश्चित जानकारी नहीं है लेकिन मैं यह सत्य ज़रूर जानता हूँ कि हम सभी को एक न एक दिन इस संसार से जाना ज़रूर है | जब हम इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि हम यहाँ हमेशा के लिए नहीं है तो हम अनेक बंधनों और अवगुणों की जंजीरों से खुद को जकड़ लेते हैं | जब हमें इस बात का एहसास बना रहता है कि हमें इस संसार से एक न एक दिन चले जाना है तो हम बुराइयों और मिथ्या बंधनों से बचे रहते हैं | तुम्हारे भीतर भी इतने बदलाव इसीलिए आए क्योंकि तुमने पिछले उनतालीस दिन यह सोचकर बिताए कि तुम्हें इस दुनिया से चले जाना है | तुम अपने सभी अधूरे कामों को पूरा करते रहे और बुराइयों से दूर बने रहे |”

इसी तरह से हमें भी हमेशा इस बात को याद रखना चाहिए कि हम इस संसार में एक ख़ास मकसद से आए हैं हमारे हैं पास भी थोड़ा ही समय है | हम न तो कुछ साथ लाए थे और न ही साथ ले जाएँगे | हमें जल्दी से जल्दी अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लेना चाहिए और उस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में काम करना चाहिए | जब हम अपने कार्यों को इस सोच के साथ करेंगे तो सभी बुराइयों और बंधनों से दूर बने रहेंगे | - रश्मि 


मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

जीवन में आगे बढ़ने के लिए संयम परम आवश्यक है

व्यक्ति किसी भी आयु-वर्ग का क्यों न हो, अगर वह अपने मन, वचन और कर्म पर संयम रख सकता है तो हर परिस्थिति का सामना कर सकता है | अक्सर व्यक्ति उत्तेजना के कारण अपने व्यवहार और अपनी स्थिति को और भी बद्तर बना देता है | मनुष्य के लिए संयम परम आवश्यक है | विपरीत परिस्थितियों में संयमलगाम का कार्य करता है | यदि अपने व्यवहार को संयमित कर लिया जाए तो अहंपर भी नियंत्रण रखा जा सकता है |       

एक बार की बात है मुहम्मद साहब और उनके दामाद हजरत अली साथ-साथ चले जा रहे थे| रास्ते में एक व्यक्ति मिला उसकी हजरत अली से पुरानी दुश्मनी चल थी | उसने हजरत अली को देखते ही अपशब्द बोलने शुरू कर दिए | पहले तो हजरत अली उन्हें अनसुना करने की कोशिश करता रहा किन्तु शीघ्र ही उसके संयम ने जवाब दे दिया| अब हजरत अली ने भी उस व्यक्ति को अपशब्द बोलने शुरू कर दिए | उनके अपशब्द और झगड़े को सुन मुहम्मद साहब आगे बढ़ गए | हजरत अली ने जब देखा कि वे तो चले जा रहे हैं तो झगड़ा बीच में ही छोड़ उनके पास आ गया | उसने पास आकर पूछा- आप मुझे उस दुष्ट के पास अकेला छोड़कर क्यों चले आए ?” मुहम्मद साहब ने हँसते हुए कहा- अली ! जब तुम उस व्यक्ति के अपशब्दों का उत्तर नहीं दे रहे थे तब तुम्हारी सभी इंद्रियाँ तुम्हारा साथ दे रहीं थीं, लेकिन जैसे ही तुमने अपनी जुबान पर से अपना संयम खोया वैसे ही तुम्हारी इन्द्रियों ने भी तुम्हारा साथ छोड़ दिया | जब तुम्हारा विवेक ही तुम्हारा साथ नहीं दे रहा था तो मैं तुम्हारा साथ कैसे दे सकता था ?”
        
आशय यह है कि यदि कोई कड़वे वचन बोले तो उसे अनसुना कर देना चाहिए | उसके वचन हमें तभी प्रभावित करेंगे जब हम खुद को प्रभावित होने देंगे | यदि हम अपना संयम कायम रखें तो अंततः वह खुद ही चुप हो जाएगा | कटु वचन बोलने वाले का मकसद ही हमें ठेस पहुँचाना और झगड़े के लिए उकसाना होता है | ऐसे में संयमही एकमात्र ऐसा उपाय है जो कवच का काम करता है | संयमी व्यक्ति में धैर्य और आत्म-नियंत्रण की ताकत होती है और इसी वजह से वह वाद-प्रतिवाद करने में रूचि नहीं लेता|
       

वाद-विवाद मनुष्य के जीवन का महत्त्वपूर्ण समय व्यर्थ ही बर्बाद कर देता है | अनेक लोगों को बिना किसी कारण के या बेहद ही मामूली सी वजह पर विवाद करते और झड़प करते देखा जा सकता है जबकि यदि उनसे उस झड़प का ओचित्य पूछा जाए तो वह निर्मूल ही होगा | मेरा मानना है कि यदि अपनी क्षमताओं का सही मूल्यांकन किया जाए और अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगा दिया जाए तो हर लक्ष्य को हासिल करना आसान हो जाता है | व्यर्थ का वाद-विवाद जीवन में रुकावटें पैदा करता है | ऐसी परिस्थितियों में संयम ही एकमात्र उपाय है | संयमी व्यक्ति बड़ी से बड़ी विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता | खुद पर संयम रखकर वह खुद को तो वहाँ से निकालता ही है साथ ही साथ उस विवाद को और आगे नहीं बढ़ने देता | इससे एक महत्त्वपूर्ण काम यह भी होता है कि उस विवाद की आग को घी नहीं मिलता और वह वहीँ पर ही समाप्त हो जाता है | - रश्मि 

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

…..और आगे बढ़ते रहो

जीवन गतिशीलता का ही दूसरा नाम है | जीवट मनुष्य सदैव गतिशील रहते हैं | रास्ते की मुश्किलें उनके लिए कभी-भी बाधा नहीं बन पातीं | मनुष्य के लिए ये आवश्यक है कि वह अपने लक्ष्यों को पाने के लिए उचित राह पर चले | रास्ते में मिलने वालीं छोटीं-छोटीं सफलताएं कभी भी ‘लक्ष्य’ नहीं होतीं, वे तो पड़ाव मात्र होतीं हैं | मनुष्य को अपनी राह पर चलते हुए थककर या संतुष्ट होकर नहीं बैठना चाहिए इससे महत्वाकांक्षाएं बाधित होती हैं | ऐसा मनुष्य कभी भी इतिहास नहीं रच सकता | यदि हम बड़े-बड़े महापुरुषों की जीवनी पढ़ें तो जानेंगें कि उनका जीवन गतिशीलता, कर्मठता और संघर्षों से भरा रहा है, उन्होंने कभी भी छोटी-छोटी बाधाओं से हार नहीं मानी | साहसी व्यक्ति तो ऐसी छोटी-छोटी बाधाओं को चुनौती के रूप में लेते हैं और दुगुने उत्साह से आगे की और बढ़ने लगते हैं | साथ ही साथ वे छोटी-छोटी उपलब्धियों को हासिल करके अपनी पीठ नहीं थपथपाते बल्कि अपनी अपनी गति को और बढ़ा देते हैं |

एक संत अपनी भक्ति और विद्वता के लिए बहुत विख्यात थे | लोग दूर-दूर से उनके दर्शनों के लिए आया करते थे | एक बार उनके पास एक लकड़हारा आया चरणों में बैठ गया | संत बहुत ज्ञानी थे अतः उसके मन की बात जान गए | किन्तु फिर भी उन्होंने अनजान बनते हुए पूछा – “तुम कहाँ से आए हो और क्या काम करते हो ?”

वह व्यक्ति बोला – “गुरुदेव ! पास के ही गाँव में रहता हूँ और लकड़ियाँ काटकर शहर ले जाकर बेचता हूँ, उसी से पूरे परिवार का गुज़ारा चलता है |”

संत ने पूछा –“ कहाँ काटते हो लकड़ी ?”

लकड़हारा बोला – “पास वाले जंगल में |”

संत ने कहा – “थोड़ा और आगे बढ़ो |” अगले दिन जब लकड़हारा लकड़ी काटने जंगल पहुंचा तो उसे संत की बात याद आ गई और वह जंगल के थोड़ा और भीतर पहुँचा | वहाँ उसे चन्दन के पेड़ मिले | कुछ दिनों के बाद वह फिर से संत के दर्शनों के लिए पहुँचा |

संत उसे देखते ही पहचान गए और हालचाल पूछने लगे - “अब भी उसी जंगल में लकड़ी काटते हो?”

वह बोला – “जी गुरुदेव |”

संत से इस बार भी कहा – “....तो थोड़ा और आगे बढ़ो |” अगले दिन वह लकड़हारा और भीतर पहुँच गया तो उसने देखा कि वहां चाँदी की खान हैं | वह बड़ा प्रसन्न हुआ और दौड़ा-दौड़ा संत के चरणों मे पहुँचा |

संत अन्तर्यामी थे, सारी बात जानते थे इसलिए मुस्कुराकर बोले-“......और आगे-आगे बढ़ते रहो |” 

उस लकड़हारे ने संत की बात गाँठ बाँध ली और धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ता रहा | उसे सोने की, फिर हीरे की खाने मिलने लगीं | इस प्रकार उसकी सारी दरिद्रता दूर हो गई और उसे आगे बढ़ते रहने का सन्देश मिला | यदि वह दूसरे या तीसरे कदम पर ही संतुष्ट होकर बैठ जाता तो उसे और उपलब्धियां कतई हासिल न होतीं | अतः मनुष्य को राह में आने वाली कठिनाइयों से घबराकर या छोटी-छोटी कामयाबियों से संतोष करके नहीं बैठ जाना चाहिए बल्कि निरंतर उत्साह और सकारात्मकता के साथ आगे की ओर बढ़ते रहना चाहिए | 

- रश्मि    

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

'रेल की यात्रा'

हमारा जीवन 'रेल की यात्रा' के जैसा है | एक ऐसी यात्रा, जिसमें अनेक स्टेशन आते हैं और दुर्घटनाएं भी होतीं हैं | हमारे इस सफ़र की शुरुवात हमारे माता-पिता के साथ होती है क्योंकि वे दोनों ही हमारे लिए इस सफ़र का टिकिट लेते हैं | अपने छुटपन में हम ये सोचते हैं कि वे इस ट्रेन में हमेशा हमारे साथ चलेंगें लेकिन वे दोनों भी अपने-अपने स्टेशनों पर चुपचाप उतर जाते हैं और हमें इस सफ़र पर अकेले आगे बढ़ने के लिए छोड़ जाते हैं | .....और फिर समय के साथ-साथ ये ट्रेन आगे बढ़ती जाती है और अलग-अलग स्टेशनों में हमें अनेक सहयात्रियों से मिलवाती है– वे सहयात्री हमारे भाई-बहन, मित्र, रिश्तेदार, प्रेमी, जीवन-साथी, बच्चे, दोस्त-दुश्मन आदि अनेक रूपों में आकर हमसे जुड़ते हैं और इस सफर के हिस्सेदार बनते हैं | धीरे-धीरे ये सब भी अपने-अपने स्टेशनों पर उतर जाते हैं| हम इनके उतर जाने पर बेहद उदास हो जाते हैं और इस सफर से उकता भी उठते हैं| किन्तु सच तो ये है कि जिस प्रकार हमारे जीवन की रेलगाड़ी में उनका चढ़ना हम तय नहीं करते उसी प्रकार से उनका उतरना भी हमारे वश में नहीं होता|

ज़िन्दगी की इस रेल में किसी स्टेशन पर हम अपने भाइयों को पाते हैं तो किसी में मित्रों को| कहीं कोई माँ-स्वरुपा मिल जाती है तो कोई हमारे गुरु-तुल्य बन जाते हैं| हमें हमारा प्यार भी अचानक किसी स्टेशन पर मिल जाता है| कोई हमसे स्वार्थ वश जुड़ जाता है तो किसी से नियति मिलवा देती है और हम अंत तक उससे प्रेम और जुड़ाव का कारण नहीं जान पाते| इस सफ़र में किसी-किसी से दिल इतने मिल जाते हैं कि हम अक्सर उन स्टेशनों से आगे बढ़ना ही नहीं चाहते और कभी-कभी कुछ ऐसे स्टेशन भी मिलते हैं जहाँ हम पल भर भी ठहरना नहीं चाहते, किन्तु हमारे जीवन का ये सफ़र बिना रुके अपनी ही गति और मर्ज़ी से चलता रहता है| हमारे जीवन में किसी का आना या किसी का चले जाना हमारी मर्ज़ी पर निर्भर नहीं है| कुछ लोग बहुत दूर तक हमारे साथ चलते हैं तो कुछ लोग चंद क़दमों के साथ से ही उकता जाते हैं| यहाँ सबसे बड़ी बात ये है कि जिस प्रकार से उनका हमारे जीवन में आना हमारे वश में नहीं है उसी प्रकार से उन्हें हम अपने जीवन से निकाल भी नहीं सकते|

इसलिए बेहतर यही है कि हम अपने जीवन को अनवरत हर्ष और उल्लास के साथ चलाते रहें| जब जब हमारे साथ की सीट पर कोई आकर बैठे तो उसे भरपूर स्नेह दें और जब अकेले हो जाएँ तो अगले स्टेशन का इंतज़ार करें क्योंकि वहाँ कोई न कोई हमारे इंतज़ार में बैठा है ; यकीनन इस सफर में कोई अकेला नहीं होता | लोग बस मिलते-बिछड़ते रहते हैं | किसी के साथ इस कदर भी न जुड़ें कि उसका स्टेशन आने पर व्याकुल हो उठें और किसी के साथ इतना भी उदासीन न हो जाएँ कि सफर काटना मुश्किल हो जाए |


हमारा सोशल मीडिया का ये सफर भी तो ‘रेल के सफर’ के समान ही है जहाँ अनेक स्टेशनों पर आप सभी लोग कभी मित्र बनकर, कभी भाई-बहन बनकर तो कभी गुरु बनकर और मार्गदर्शक बनकर हमसे आ जुड़ते हैं | तो मित्रों! क्यों न अपने जीवन के इस सफर को और खुशनुमा बनाया जाए अनेक मीठी यादें दी जाएँ ली जाएँ | आखिर चलना तो हम सबको साथ ही है | है न ? – आपकी रश्मि          

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

अज्ञान का तिमिर मिटा पाएँ

अपना आँगन रौशन करके, दीयों और चरागों से ।
सारा तिमिर हरण कर डाला, जगमग लड़ियों के हारों से ।।

स्वागत में माता की हमने, सारी तैय्यारी कर डाली ।
मेवों और मिष्ठानों से, चाँदी की थाली भर डाली ।।

बारूद पटाखे ढेर किए, फुलझड़ियों का अंबार किया ।
जिस देवी को पूजा हमने, उस देवी को ही स्वाह किया ।।

निज स्वार्थ सारे रिश्तों को, गले लगाया नेह दिया ।
वैभव के तराजू में हमने, मालूम लड़कपन तौल दिया ।।

अपनी खुशियाँ अपना आँगन, बस अपने तक ही सिमट रहे ।
मीठे लजीज़ पकवानों की, थाली में ही बंटे रहे ।।

...पर न जाने कितने घर हैं, जहाँ आज भी घना अँधेरा है ।
उनकी दीपक सी आँखों में, अँधियारों का पहरा है ।।

क्या अपने घर की जगमग से, जगमग दीवाली मनती है?
जब हर आँगन हँस उठता है, तब ही दीवाली मनती है ।।

इस दीवाली हम सब मिलकर, विश्वास का दीपक बन जाएँ ।
अंतर्मन को रौशन कर लें, अज्ञान का तिमिर मिटा पाएँ ।।

-रश्मि
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रविवार, 19 अक्टूबर 2014

माँगना नहीं देना सीखो

माँगना नहीं देना सीखो
    
मनुष्य का स्वभाव भी बड़ा अजीब होता है | वह हमेशा कुछ न कुछ पाने की जद्दोजहद में लगा रहता है | समाज से, राष्ट्र से, रिश्तों से सभी से कुछ न कुछ माँगने की ही चेष्टा में रहता है | सबसे विचित्र बात ये है कि इस माँग का कोई अंत नहीं है |
       
हम हमेशा असंतुष्ट से माँगते ही रहते हैं | हमें इतना अव्यवस्थित, असंतुष्ट किसने बना रखा है ? हमारी माँग ने, इच्छाओं ने, जो कभी ख़त्म नहीं होतीं | हम अपने पूरे जीवन भर सबसे प्यार माँगते हैं और खुद किसी को न प्यार ही दे पाते हैं और न ही विश्वास | हम हमेशा धन की ख्वाहिश करते हैं लेकिन कभी भी अपनी जेब से किसी ज़रूरतमंद पर खर्च नहीं करना चाहते | अपने अंतिम समय तक ईश्वर से भी कुछ-न-कुछ फ़रियाद ही करते रहते हैं लेकिन उसे अपनी निश्छल-भक्ति और श्रद्धा नहीं दे पाते | इसीलिए वॉटर टोंपिल कहते हैं -“मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो रोता हुआ पैदा होता है और निराशा में मरता है |”

हमारे बुज़ुर्ग एक कहानी कहते हैं-
      
शुरू-शुरू में ईश्वर ने सभी प्राणियों को बराबर आयु दी थी | सभी को चालीस-चालीस वर्ष आयु मिली | मनुष्य को अपनी उम्र काफी कम लगी और वह लोभ-वश और चाहने लगा| गधे को भी चालीस वर्ष आयु मिली थी लेकिन वह दूसरों का बोझ ढोते-ढोते इतना उकता चुका था कि अपनी आयु घटवाना चाहता था | ईश्वर ने दोनों के मन की बात जान ली और गधे की आयु के बीस वर्ष मनुष्य को दे दिए | इसीलिए हम चालीस वर्ष की उम्र के बाद जिम्मेदारियों के बोझ से दबे होते हैं | घर, परिवार, नौकरी, बच्चे, धन, माँ-प्रतिष्ठा इन्हीं सबको जोड़ने में उलझे रहते हैं | कुछ समय के बाद कुत्ते को भी अपनी चालीस वर्ष की उम्र लम्बी और उबाऊ लगने लगी | पूरे-पूरे दिन भौंकते रहना, इसके अतिरिक्त और कोई काम नहीं | अतः वह भी अपनी फरियाद लेकर ईश्वर के पास पहुँच गया | इधर मनुष्य को अब भी अपनी आयु कम लग रही थी और उसने कुत्ते की उम्र के बीस साल भी स्वीकार कर लिए | इसीलिए साठ वर्ष के बाद मनुष्य को रिटायर समझा जाता है और वह चाहे जितनी भी नसीहत दे, कोई उसकी बात को तवज्जो नहीं देता | आश्चर्य ये कि इतने पर भी मनुष्य की इच्छा का अंत नहीं हुआ, वह अब भी अपने जीवन से असंतुष्ट ही रहा | शायद उसे खुद ही पता नहीं था कि उसे क्या चाहिए| उसे जो भी मिला, वह लेता रहा | आखिरकार उल्लू को भी एहसास हुआ कि उसकी उम्र भी कुछ ज्यादा है | वह दिन-रात औंधा पड़ा करता ही क्या है ? इसीलिए उसने भी ईश्वर से अपनी आयु कम कर देने की विनती की | ईश्वर ने देखा कि मनुष्य का लोभ तो अब भी नहीं मिटा है और उसने उल्लू की आयु भी मनुष्य को ही दे दी | तभी से अस्सी वर्ष के बाद मनुष्य को न नींद आती है, न दिखाई देता है और न ही सुनाई देता है | वह रात-रात भर जागता रहता है |
       
इसीलिए ज्ञानी समझाते हैं कि ईश्वर से लम्बी आयु मत माँगो बल्कि बड़ी आयु माँगो | कभी भी अथाह धन की लालसा मत करो बल्कि कम-से-कम धन के भी सही उपयोग का ज्ञान माँगो | रिश्तों से प्यार मत माँगो बल्कि उन्हें इतना स्नेह दो कि वे सदा-सदा के लिए आपके हो जाएँ | हमारा देश, हमारा समाज सब हमसे ही है और ये समृद्ध हैं तो हमारा अस्तित्व भी है इसीलिए ये मत सोचो कि देश और समाज ने हमें क्या दिया बल्कि खुद उसे देना सीखो | फिर एक दिन ऐसा होगा कि हम देते-देते भी पूरी तरह से तृप्त हो उठेंगे, प्रेम और संतुष्टि से भर उठेंगे | - रश्मि


गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

सजगता का होना अति आवश्यक

सजगता का होना अति आवश्यक
         
इंसान में सजगता का होना अति आवश्यक है | सजगता माने सदैव अलर्ट रहना | जब तक मनुष्य के भीतर सतर्कता नहीं जागती तब तक उसके जीवन के कोई मायने नहीं है | सतर्क व्यक्ति हर लक्ष्य प्राप्त कर सकता है और ईश्वर तक के करीब पहुँच सकता है | अपने टारगेट्स को लेकर चौकन्ना या सतर्क रहने वाला व्यक्ति पूरी चैतन्यता के साथ उससे जुड़ जाता है | उसकी समस्त मानसिक शक्ति और शारीरिक ऊर्जा अपने लक्ष्य को पाने में लग जाती है जबकि जो लोग लापरवाह या आरामतलब होते हैं, वे हर परिस्थिति को बड़े ही सहज तरीके से ले लेते हैं | नतीजा ये होता है कि लक्ष्य-प्राप्ति की ओर उनकी रफ़्तार में बाधा पहुँचती है | इस बात को और बेहतर तरीके से समझाने के लिए एक रोचक जानकारी साझा करना चाहूँगी तलवारबाजी के लिए बेहद सतर्कता की आवश्यकता होती है | जो इंसान बेहद चौकन्ना होता है वही इस विद्या को सीख सकता है | जापान के कई स्कूलों में तलवारबाज़ी सिखाई जाती है और उन स्कूलों के बोर्ड में लिखा होता है – ‘हाउस ऑफ़ गॉड’ | इस सन्दर्भ में ओशो एक रोचक कहानी कहते हैं- एक बार एक शिष्य तलवार सीखने के उद्देश्य से गुरु के आश्रम में पहुंचा | गुरु ने पूछा- क्या तुम लम्बे समय तक यहाँ रह सकते हो क्योंकि तलवार चलाना सीखने में कई वर्ष भी लग सकते हैं | कुछ लोग तो इस कला को कुछ ही समय में सीख जाते हैं और कुछ लोग जीवन भर नहीं सीख पाते | इसके लिए बेहद सजगता की आवश्कता होती है |” शिष्य ने रुकने की हामी भर दी | जब उस शिष्य को आश्रम में रहते हुए करीब साल भर बीत गया तो उसने गुरु जी से कहा- कृपया अब मुझे भी यह विद्या सिखाइए |” गुरु ने कहा- नहीं ! अभी तुम आश्रम की सेवा, साफ़-सफाई आदि का काम करो | सही वक्त आने पर सिखाउंगा |” ये सब काम करते हुए उसे फिर साल भर हो गए और उसने फिर प्रार्थना की | एक दिन की बात है वो किसी काम ने तल्लीन था, और गुरु ने पीछे से लकड़ी की तलवार से वार कर दिया | वह चौंक पड़ा | अब ऐसा नियमित होने लगा | वह किसी काम में डूबा होता, सो रहा होता, भोजन कर रहा होता और गुरु अचानक से वार कर देते | वह घबरा उठा | अब वह सदैव ही सतर्क रहने लगा | उसकी उठने, बैठने, लेटने आदि की मुद्राएँ भी उसकी सतर्कता का परिचय देने लगीं | अब गुरु जैसे ही वार करते, वह चौकन्ना हो जाता और हाथ से बचाव कर लेता | उसने भी गुरु से तलवार माँगी और सिखाने की विनती की लेकिन गुरु ने इस बार भी इंकार कर दिया | एक रात वह उठा और उसने नींद में डूबे गुरु के ऊपर तलवार तान दी | वह वार करने ही वाला था कि गुरु ने अपनी आँखें खोले बिना ही उसे रुकने का आदेश दिया | वह हैरान रह गया | उसने पूछा – “आपकी आँखें तो बंद थीं फिर आपको मेरे वार करने का पता कैसे चला !गुरु ने समझाया – “यह सतर्कता की वह स्थिति है जब दूसरों की पदचाप, मन की गति और विचारों की आवाज़ भी सुनाई देने लगती है | जिस दिन तुमने ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली समझो तलवारबाजी का असली ज्ञान प्राप्त कर लिया |”
इसी प्रकार की चैतन्यता से अपने लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है | और तो और ईश्वर को प्राप्त करने में भी यही चैतन्यता आवश्यक होती है | जब मनुष्य सोते-जागते, उठते-बैठते प्रत्येक कार्य करते अपने लक्ष्य से जुड़ा रहता है और उसकी समस्त चेतना उसी में लगी रहती है तभी उसे सफलता की प्राप्ति हो पाती है | -रश्मि 


मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

लगातार किया जाने वाला प्रयास परिणाम अवश्य देता है

लगातार किया जाने वाला प्रयास परिणाम अवश्य देता है

       अपनी दिशा में निरंतर बढ़ते रहना चाहिए | अपने प्रयासों को कभी भी कम या निरर्थक नहीं समझना चाहिए क्योंकि लगातार किया जाने वाला प्रयास परिणाम अवश्य देता है | आवश्यकता है तो बस परिश्रम और विश्वास की |
एक किस्सा है
       एक चिड़िया थी | उसने आराम से रहने के लिए एक शानदार घोंसला बनाने का विचार किया | उसने सोचा कि वह इसमें अपने अण्डों को सहेज सकेगी | फिर बाद में वह और उसके बच्चे उस घोंसले में सुख से रहेंगे | उसने इधर-उधर देखा उसे एक पेड़ नजर आया और फिर उसने उसकी डाल पर घोंसला बनाना शुरू कर दिया |
      तभी वहां एक गिलहरी आई और बोली - अरे चिड़िया ! ये क्या कर रही हो, यहाँ तो माली तुम्हारा घोंसला तोड़ देगा |”
      चिड़िया को उसकी बात सही लगी और वह अपना घोंसला अधूरा बना छोड़ वहां से चली गई | अब उसने एक घर के छज्जे पर घोंसला बनाना शुरू कर दिया | कुछ देर बाद आधा घोंसला बनकर तैयार हो गया | यह देखकर वह चिड़िया काफी खुश हुई कि तभी अचानक उसकी नजर घर की दीवार पर बैठी बिल्ली पर पड़ी | बिल्ली उसे देखकर हँस रही थी |
      चिड़िया गुस्से से बोली - “हँस क्यों रही हो ?”
     “हँसू नहीं तो और क्या करूँ !  इस घर का मालिक एक ही बार में तुम्हारे घोंसले को उठाकर फेंक देगा |”
      ये बात भी चिड़िया के दिमाग में बैठ गई | उसने अच्छी सलाह के लिये बिल्ली को धन्यवाद दिया और आधे बने घोंसले को छोड़कर दूसरी जगह तलाश करने लगी | उसने एक बगीचे में खड़ी पत्थर की विशाल मानव मूर्ति के अंगों के बीच में सुरक्षित जगह खोजकर घोंसला बनाना शुरू कर दिया | वह कुछ देर तक घोंसला बनाती रही |
        तभी एक बन्दर आया और चिड़िया का मजाक उड़ाते हुए बोला- “अरे चिड़िया ! तू भी कितनी बेवकूफ है |”
      “क्यों ?” चिड़िया ने गुस्से से पूछा |
      बन्दर उसे समझाने लगा- “अरे ! यहां तो बड़ी तेज हवा चलती है | यहाँ तो तू अपने घोंसले के साथ ही उड़ जायेगी |”
      चिड़िया को बन्दर दादा की बात ठीक लगी और वह वहाँ भी घोंसला अधूरा बना छोड़कर सोचने लगी कि अब कहाँ अपना घोंसला बनाया जाए ! समय काफी बीत चुका था और उसे भूख भी लगने लगी थी | बार-बार प्रयास करने के कारण वह काफी थक भी चुकी थी और अब उसके अन्दर घोंसला बनाने की ताक़त भी नहीं बची थी |
      एक बूढ़ा कबूतर बहुत देर से चिड़िया को देख रहा था | उसने पास आकर परेशान चिड़िया को समझाया - तुम बार-बार अपना काम शुरू करती हो और दूसरों के कहने पर उसे अधूरा छोड़ देती हो | जो लोग अपनी बुद्धि न लगाकर दूसरों के कहने पर अपना काम बीच में ही अधूरा छोड़ देते हैंउनका यही हाल होता है |” ऐसा कहकर वह उड़ गया | अब तक चिड़िया को भी अपनी गलती का एहसास हो चुका था |

          हमारी ज़िन्दगी मे भी कई बार ऐसा ही होता है| हम जोश में आकर कोई काम शुरू तो करते हैं|
 किन्तु दूसरों की बातों में आकर उसे बीच में ही छोड़ भी देते हैं | शुरू-शुरू में तो हम उस काम के लिए खूब उत्साहित रहते हैं लेकिन फिर धीरे-धीरे लोगों की सलाहों की वजह से हमारा उत्साह कम होने लगता है और हम अपना काम बीच मे ही छोड़ देते हैं | बाद में जब हमें पता चलता है कि हम अपनी सफलता के कितने नज़दीक थे तो फिर पछतावे के अलावा कुछ शेष नहीं बचता | इसीलिए हमें लगातार काम करते रहना चाहिए और विश्वास रखना चाहिए कि एक दिन सफलता ज़रूर मिलेगी |
-रश्मि 


सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

मनुष्य-जीवन : एक यात्रा के समान

मनुष्य-जीवन : एक यात्रा के समान
         
        मनुष्य-जीवन एक यात्रा के समान है | हम सब यहाँ अपने-अपने हिस्से का सफर तय करते हैं | हर व्यक्ति के जीवन का ख़ास मकसद है | हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हम इस धरती पर किसी ख़ास कार्य को करने के लिए ही आए हैं | यही कारण है कि हमारे जीवन का सफ़र निरंतर चलता रहता है | यदि हम रुक भी जाएँतो भी जीवन कभी नहीं रुकताकभी नहीं थमता | जो लोग निरंतर अपने कर्तव्य-पथ पर चलते रहते हैं और अपनी मंजिल पर निगाह गड़ाए रहते हैं वे ही इतिहास रच पाते हैं | जबकि वे लोग जो हमेशा हताश और निराश रहते हैं और अपने जीवन को बे-मक़सद आगे की ओर धकेले चले जाते हैंवे किसी भी मंजिल पर नहीं पहुँच पाते और एक दिन बिना कोई योगदान दिए इस संसार से भी विदा हो जाते हैं |
        जीवन-यात्रा कभी भी निरर्थक नहीं होनी चाहिएउसका कोई न कोई प्रयोजन ज़रूर होना चाहिए | ये नहीं कि कटी पतंग के समान किसी भी ओर उड़ चले | जिस प्रकार धरती की ओर गिरती हुई कटी पतंग का कोई निश्चित ठिकाना नहीं होता उसी प्रकार बे-मकसद और अनजाना सफ़र तय करने वाला इंसान किसी मंजिल तक नहीं पहुँच पाता | अक्सर ये भी होता है कि कुछ लोगों को अपनी मंजिल तो पता होती है लेकिन सफ़र का सही-सही ज्ञान नहीं होता | वे तय ही नहीं कर पाते कि किस राह का चुनाव करना है |
        एक बार एक लड़का अपनी राह चला आ रहा था | उसे अपनी मंजिल पता थी | .....लेकिन अचानक वह एक ऐसे चौराहे पर पहुँच गया जहाँ से आगे किस दिशा की ओर बढ़ा जाए ये तय करना उसके लिए मुश्किल हो रहा था | वह नहीं समझ पा रहा था कि उसे किस ओर जाकर अपनी मंजिल मिलेगी | सफ़र लम्बा भी था अतः सोच समझकर ही कोई निर्णय लेना था | उसने चौराहे पर लगे दिशा-सूचक संकेत को खोजा लेकिन वह भी उखड़ा पड़ा था | लड़का अब तक काफी भ्रमित हो चुका था |
       लगभग ऐसी ही स्थिति आजकल के युवाओं की भी हो रही है वे चुस्त हैंबुद्धिमान हैंसक्षम हैं किन्तु कभी-कभी जीवन-राह में आने वाले चौराहों पर भ्रमित हो जाते हैं कि आगे कौन-सी राह पकड़ी जाए !! इसका एक बेहद आसान उपाय है - वह लड़का उस चौराहे तक किसी एक राह से तो चलकर आया ही है न ऐसे में यदि वह उस दिशा-सूचक की एक दिशा-संकेत को भी सही दिशा की ओर लगा दे (जिस दिशा से चलकर वो आया है) तो बाकी की तीन दिशाएँ स्वत: ही स्पष्ट हो जाएंगीं और वह निर्णय भी कर पाएगा कि उसे किस ओर जाना है वह अपनी मंजिल तक बिना भटके और बिना अतिरिक्त समय गँवाए पहुँच सकेगा |                     इसी प्रकार हर व्यक्ति किसी न किसी राह पर चल ही रहा होता है | व्यक्ति अपने विगत जीवन में जिस राह से चलकर आ रहा होता हैवही राह उसके आगे के रास्ते को भी तय करती है इसीलिए भविष्य की कामयाबी के लिए बचपन से ही सही राह पर ही सफ़र प्रारम्भ करना चाहिए रास्ते में आने वाला एक छोटा-सा बैरियर या छोटा-सा भटकाव भी असफलता का कारण बन सकता है |  
-------------------------------------------------------------------रश्मि